भास्कर एक्सप्लेनर · प्लास्टिक नोट/28 जुलाई 2026

ऑस्ट्रेलिया की गैराज में ऐसा क्या हुआ कि प्लास्टिक नोट लाने पड़े; जल्द आपके हाथों में भी होंगे

भारत में ₹10 और ₹20 के प्लास्टिक नोट के फील्ड ट्रायल की मंजूरी मिल चुकी है — 3 हजार करोड़ रुपए कीमत के 200 करोड़ नोट जल्द लोगों की जेब में होंगे। यह आइडिया 1966 में मेलबर्न के एक गैराज में छपे नकली नोटों से शुरू होकर, 17 साल ठंडे बस्ते में रहने के बाद लौटा है। इन पांच विजेट्स में वही पूरी कहानी — नकल का किस्सा, नोट बनने की मशीन, छोटे नोटों का असली हिस्सा, पॉलिमर का हिसाब और भारत का 17 साल का सफर।

लेखक: भास्कर एक्सप्लेनर डेस्क

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गैराज गिरोह: किसने क्या किया?

1966 में मेलबर्न के एक गैराज में दुकानदार, आर्टिस्ट, फोटोग्राफर और टेलर ने 10 डॉलर के नकली नोट छापे। किरदार और काम का मिलान कीजिए, फिर बेनकाब कीजिए कि गिरोह कैसे पकड़ा गया — और उसी घोटाले से दुनिया का पहला प्लास्टिक नोट कैसे जन्मा।

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नोट बनने की मशीन के अंदर

BOPP के दाने पिघलने से बड़े गुब्बारे, सफेद कोटिंग, पारदर्शी विंडो और होलोग्राम तक — प्लास्टिक नोट की प्रोडक्शन लाइन स्टेप-दर-स्टेप चलाइए, और आखिरी स्टेशन पर देखिए नकली पॉलिमर की रियलिटी चेक।

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गिनती में 25%, कीमत में 1.3%

भारत के कागजी नोटों में हर चौथा नोट ₹10 या ₹20 का है, लेकिन कीमत में हिस्सा देढ़ फीसदी से भी कम। नाप बदलकर देखिए और समझिए कि 200 करोड़ नोटों का ट्रायल इन्हीं दो नोटों से क्यों शुरू हो रहा है।

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महंगा नोट, सस्ता हिसाब

पॉलिमर नोट कागज से 2-6 गुना चलता है, छपाई 30-60% महंगी है — दोनों अंदाज़े खुद घुमाइए और देखिए हर नोट-जान की कीमत में कौन जीतता है। साथ में ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन की असली बचत के आंकड़े।

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17 साल का सफर, एक पट्टी पर

2009 में RBI का आइडिया, 2012 की मंजूरी, फिर 7 साल खामोशी और 27 जुलाई 2026 को लोकसभा में ऐलान — समय-पट्टी पर ₹10 का नोट खींचिए और पूरा सफर खुद पूरा कीजिए।

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