न डीजल, न ओवरहेड तार
कटअवे में H₂ टैंक, बैलार्ड का फ्यूल सेल, बैटरी और इलेक्ट्रिक मोटर एक साथ दिखते हैं। पांचों पड़ाव चुनकर देखिए बिजली कहां बनती है और पानी कहां से निकलता है।
17 जुलाई को जींद स्टेशन से भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन चली — जींद से सोनीपत के बीच 89 किलोमीटर, 2600 यात्री क्षमता, और धुएं की जगह सिर्फ पानी। इन आठ विजेट्स में उसी रिपोर्टिंग के आंकड़े हैं: ट्रेन के अंदर का सिस्टम, हाइड्रोजन का महंगा हिसाब, बनाने के तीन तरीकों का कार्बन, ढाई सौ साल के ग्यारह पड़ाव, एक दिन के चार फेरों का ईंधन, टैंक का दबाव, पानी से हाइड्रोजन तक का रसायन, और आगे के दो रास्ते।
लेखक: आदित्य द्विवेदी
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कटअवे में H₂ टैंक, बैलार्ड का फ्यूल सेल, बैटरी और इलेक्ट्रिक मोटर एक साथ दिखते हैं। पांचों पड़ाव चुनकर देखिए बिजली कहां बनती है और पानी कहां से निकलता है।
एक किलो हाइड्रोजन बनाने में करीब 50 यूनिट बिजली जाती है। मापक पर अपना अंदाजा दर्ज कीजिए, फिर रिपोर्ट का 3.5 लीटर का जवाब उसी पैमाने पर देखिए।
दुनिया की करीब 90% हाइड्रोजन प्राकृतिक गैस से बनती है। तीनों चेन एक साथ देखिए और हर तरीके का कार्बन ट्रेस कीजिए — हवा में, जमीन में, या कहीं नहीं।
कैवेंडिश की खोज से जींद स्टेशन तक। ग्यारह पड़ाव एक साथ, जिनमें दो बार हाइड्रोजन पीछे धकेली गई — 1937 का हिंडनबर्ग हादसा और 2024 में जर्मनी का पीछे हटना।
89 किमी का रूट, रोज दो राउंड ट्रिप। ट्रेन को चारों फेरों पर खिसकाइए और देखिए कि 356 किमी में करीब 300 किलो हाइड्रोजन खर्च होने के बाद टैंक में कितनी बचती है।
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एक टैंक, 500 बिंदु, हर बिंदु 1 बार यानी साधारण हवा का दबाव। हवा, ट्रेन के टैंक और स्टोरेज की 200 से 500 गुना जरूरत की तुलना कीजिए।
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पीरियोडिक टेबल का नंबर 1 तत्व धरती पर ज्यादातर पानी में बंधा मिलता है। पानी में करंट दौड़ाइए और देखिए कि जोड़ी टूटने पर भी हाइड्रोजन अकेला नहीं रहता।
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प्रयोग कामयाब रहा तो कालका-शिमला जैसे पहाड़ी रूट, नाकाम या महंगा रहा तो जर्मनी की तरह दूरी। कांटा बदलकर दोनों रास्ते देखिए।
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